चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पर: | बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: सततं भव ॥57॥
(सर्वकर्माणि) सब कर्मोंको (चेतसा) मनसे (सóयस्य) त्याग कर तथा (बुद्धियोगम्) ज्ञान योगको (उपाश्रित्य) आश्रय करके (मयि) मेरे (मत्परः) मत पर आधारित होकर और (सततम्) निरन्तर (मच्चित्तः) मेरे में चितवाला (भव) हो।
सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके (गीता अध्याय 9 श्लोक 27 में जिसकी विधि कही है) तथा समबुद्धि रूप योग को अवलंबन करके मेरे परायण और निरंतर मुझमें चित्तवाला हो।