यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे | मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥59॥
(यत्) जो तू (अहंकारम्) अहंकारका (आश्रित्य) आश्रय लेकर (इति) यह (मन्यसे) मान रहा है कि (न,योत्स्ये) मैं युद्ध नहीं करूँगा, (ते) तेरा (एषः) यह (व्यवसायः) निश्चय (मिथ्या) मिथ्या है क्योंकि तेरा (प्रकृतिः) क्षत्राी स्वभाव (त्वाम्) तुझे (नियोक्ष्यति) जबरदस्ती युद्धमें लगा देगा।
जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्ध में लगा देगा।