स्वभावजेन कौन्तेय निबद्ध: स्वेन कर्मणा | कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥60॥
(कौन्तेय) हे कुन्तीपुत्रा! (यत्) जिस कर्मको तू (मोहात्) मोहके कारण (कर्तुम्) करना (न) नहीं (इच्छसि) चाहता (तत्) उसको (अपि) भी (स्वेन्) अपनेपूर्वकृत (स्वभावजेन) स्वाभाविक क्षत्राी (कर्मणा) कर्मसे (निबद्धः) बँधा हुआ (अवशः) परवश होकर (करिष्यसि) करेगा।
हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा।