इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन | न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥67॥
(ते) तुझे (इदम्) यह गीतारूप रहस्यमय उपदेश (कदाचन) किसी भी कालमें (न) न तो (अतपस्काय) तपरहित मनुष्यसे (वाच्यम्) कहना चाहिए (न) न (अभक्ताय) भक्तिरहितसे (च) और (न) न (अशुश्रूषवे) बिना सुननेकी इच्छावालेसे ही कहना चाहिए (च) तथा (यः) जो (माम्) मुझमें (अभ्यसूयति) दोषदृृष्टि रखता है (न) नहीं कहना चाहिए।
तुझे यह गीत रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-(वेद, शास्त्र और परमेश्वर तथा महात्मा और गुरुजनों में श्रद्धा, प्रेम और पूज्य भाव का नाम 'भक्ति' है।)-रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए।