श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नर: | सोऽपि मुक्त: शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥71॥
(यः) जो (नरः) मनुष्य (श्रद्धावान्) श्रद्धायुक्त (च) और (अनसूयः) दोष-दृष्टिसे रहित होकर इस गीताशास्त्राका (श्रृणुयात् अपि) श्रवण भी करेगा, (सः) वह (अपि) भी (मुक्तः) मुक्त होकर (पुण्यकर्मणाम्) उत्तम कर्म करनेवालोंके (शुभान्) श्रेष्ठ (लोकान्) लोकोंको (प्राप्नुयात्) प्राप्त होगा।
जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा।