य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् | उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥19॥
(यः) जो (एनम्) इसको (हन्तारम्) मारनेवाला (वेत्ति) समझता है (च) तथा (यः) जो (एनम्) इसको (हतम्) मरा (मन्यते) मानता है (तौ) वे (उभौ) दोनों ही (न) नहीं (विजानीतः) जानते क्योंकि (अयम्) वह वास्तवमें (न) न तो किसीको (हन्ति) मारता है और (न) न किसीके द्वारा (हन्यते) मारा जाता है। भावार्थ:- पूर्ण ब्रह्म का अभेद सम्बन्ध होने से आत्मा मरती नहीं तथा पूर्ण प्रभु दयालु है वह किसी को मारता नहीं। जो कहे कि आत्मा मरती है व पूर्ण परमात्मा किसी को मारता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं।
जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी द्वारा मारा जाता है।