वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् | कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥21॥
(पार्थ) हे पृथापुत्रा अर्जुन! (यः) जो व्यक्ति (एनम्) इस आत्म सहित परमात्मा को (अविनाशिनम्) नाशरहित (नित्यम्) नित्य (अजम्) अजन्मा और (अव्ययम्) अविनाशी (वेद) जानता है (सः) वह (पुरुषः) व्यक्ति (कम्) किसको (घातयति) मरवाता है और (कथम्) कैसे (कम्) किसको (हन्ति) मारता है? (अध्याय 2 श्लोक 22-23 में जीवात्मा की स्थिति बताई है।)
हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?