एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु | बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥39॥
(पार्थ) हे पार्थ! (एषा) यह (बुद्धिः) ज्ञानवाणी (ते) तेरे लिये (साङ्ख्ये) ज्ञानयोगके विषयमें (अभिहिता) कही गयी (तु) और अब तू (इमाम्) इसको (योगे) योगके विषयमें (श्रृणु) सुन (यया) जिस (बुद्धया) बुद्धिसे (युक्तः) युक्त हुआ तू (कर्मबन्धम्) कर्मोंके बन्धनको (प्रहास्यसि) भलीभाँति त्याग देगा यानी सर्वथा नष्ट कर डालेगा। गीता अध्याय 6 श्लोक 46 में कहा है कि ज्ञान योगियों और कर्मयोगियों से तत्वदर्शी सन्त अर्थात् योगी श्रेष्ठ है। इसी गीता अध्याय 5 श्लोक 2 में शास्त्राविरूद्ध ज्ञान योगी अर्थात् सन्यासी तथा कर्मयोगी दोनों को ही अश्रेष्ठ कहा है।
हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गई और अब तू इसको कर्मयोग के (अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखें।) विषय में सुन- जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भली-भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा।