Chapter 2, Verse 46



यावानर्थ उदपाने सर्वत: सम्प्लुतोदके | तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानत: ॥46॥

Word Meanings

(सर्वतः) सब ओरसे (सम्प्लुतोदके) परिपूर्ण जलाशयके प्राप्त हो जाने पर (उदपाने) छोटे जलाशयमें मनुष्यका (यावान्) जितना (अर्थः) प्रयोजन रहता है पूर्ण परमात्माको (विजानतः) तत्वसे जाननेवाले (ब्राह्मणस्य) विद्वानका (सर्वेषु) समस्त (वेदेषु) ज्ञानों में (तावान्) उतना ही प्रयोजन रह जाता है। भावार्थ:- जिस प्रकार बहुत बड़े जलास्य (जिस का जल दस वर्ष वर्षा न होने पर भी समाप्त न हो) के प्राप्त हो जाने के पश्चात् छोटे जलास्य (जिस का जल एक वर्षा न होने पर समाप्त हो जाए) में जैसी श्रद्धा रह जाती है(छोटा जलास्य बुरा नहीं लगता परन्तु उसकी क्षमता का ज्ञान हो जाता है) इसी प्रकार तत्वज्ञान की प्राप्ति पर अन्य ज्ञानों (चारों वेदों अठारह पुराणों व गीता जी आदि) मैं ऐसी श्रद्धा रह जाती है। क्योंकि उनमें पर्याप्त ज्ञान नहीं है। इसी प्रकार तत्वज्ञान के आधार से पूर्ण परमात्मा के गुणों का ज्ञान हो जाने पर अन्य परमात्माओं (परब्रह्म, ब्रह्म तथा श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव व दुर्गा) में ऐसी ही श्रद्धा रह जाती है। ये अन्य देवता बुरे नहीं लगते परन्तु इनसे मिलने वाला लाभ पर्याप्त नहीं है।

Translation

सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है।