श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला | समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥53॥
(श्रुतिविप्रतिपन्ना) भाँति-भाँतिके वचनोंको सुननेसे विचलित हुई (ते) तेरी (बुद्धिः) बुद्धि (अचला) स्थिर होकर (यदा) जब (समाधौ) तत्वज्ञान के आधार से एक परमात्मा के चिन्तन में (अचला)स्थाई रूप से (स्थास्यति) ठहर जायगी (तदा) तब तू (योगम्) योग अर्थात् भक्तिको (अवाप्स्यसि) प्राप्त हो जायगा। तब तेरी भक्ति प्रारम्भ हो जायेगी। अर्थात् तब तू योगी बनेगा। गीता अध्याय 6 श्लोक 46 में कहा है कि अर्जुन तू योगी बन।
भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा।