विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन: | रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥59॥
(निराहारस्य) इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंको ग्रहण न करनेवाले (देहिनः) पुरुषके भी केवल (विषयाः) विकार (विनिवर्तन्ते) निवृत्त हो जाते हंै (रसवर्जम्) आसक्ति निवृत्त नहीं होती। (अस्य) इस स्थिर बुद्धि वालेके (परम्) उत्तम (दृष्टवा) देखने अर्थात् विकारों से होने वाली हानि को जानने वाले के (रसः) आसक्ति (अपि) भी (निवर्तते) निवृत्त हो जाती है।
इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है।