कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता: | यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥7॥
(कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः) कायरतारूप दोषसे उपहत हुए स्वभाववाला तथा (धर्मसम्मूढचेताः) धर्मके विषयमें मोहितचित्त हुआ मैं (त्वाम्) आपसे (पृच्छामि) पूछता हूँ कि (यत्) जो साधन (निश्चितम्) निश्चित (श्रेयः) कल्याणकारक (स्यात्) हो (तत्) वह (मे) मेरे लिए (बू्रहि) कहिये क्योंकि (अहम्) मैं (ते) आपका (शिष्यः) शिष्य हूँ इसलिए (त्वाम्) आपके (प्रपन्नम्) शरण हुए (माम्) मुझको (शाधि) शिक्षा दीजिये।
इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए।