न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् | अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥8॥
(हि) क्योंकि (भूमौ) भूमिमें (असपत्नम्) निष्कण्टक (ऋद्धम्) धनधान्य-सम्पन्न (राज्यम्) राज्यको (च) और (सुराणाम्) देवताओंके (आधिपत्यम्) स्वामीपनेको (अवाप्य) प्राप्त होकर (अपि) भी मैं उस उपाय को (न) नहीं (प्रपश्यामि) देखता हूँ (यत्) जो (मम) मेरी (इन्द्रियाणाम्) इन्द्रियोंके (उच्छोषणम्) सूखानेवाले (शोकम्) शोकको (अपनुद्यात्) समाप्त कर सकें। भावार्थ:- अर्जुन कह रहा है कि भगवन यदि मुझे सारी पृथ्वी का राज्य प्राप्त हो चाहे देवताओं का भी स्वामी अर्थात् इन्द्र पद प्राप्त हो, मैं नहीं देखता हूं कि कोई मुझे युद्ध के लिए तैयार कर सकता है अर्थात् मैं युद्ध नहीं करूंगा, ऐसे कह कर चुप हो गया।
क्योंकि भूमि में निष्कण्टक, धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके।