Chapter 3, Verse 16



एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह य: | अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥16॥

Word Meanings

(पार्थ) हे पार्थ! (यः) जो पुरुष (इह) इस लोकमें (एवम्) इस प्रकार परम्परासे (प्रवर्तितम्) प्रचलित (चक्रम्) सृष्टिचक्रके (न, अनुवर्तयति) अनुकूल नहीं बरतता अर्थात् अपने कत्र्तव्यका पालन नहीं करता (सः) वह (इन्द्रियारामः) इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला (अघायुः) पापी पुरुष (मोघम्) व्यर्थ ही (जीवति) जीवित है।

Translation

हे पार्थ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुकूल नहीं बरतता अर्थात अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है।