तस्मादसक्त: सततं कार्यं कर्म समाचर | असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुष: ॥19॥
(तस्मात्) इसलिये तू (सततम्) निरन्तर (असक्तः) आसक्तिसे रहित होकर सदा (कार्यम् कर्म) शास्त्रा विधि अनुसार कर्तव्यकर्मको (समाचर) भलीभाँति करता रह। (हि) क्योंकि (असक्तः) इच्छासे रहित होकर (कर्म) भक्ति कर्म (आचरन्) करता हुआ (परम् पूरुषः) पूर्ण परमात्माको (आप्नोति) प्राप्त हो जाता है।
इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्यकर्म को भलीभाँति करता रह क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।