उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् | सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमा: प्रजा: ॥24॥
(चेत्) यदि (अहम्) मैं (कर्म) कर्म (न) न (कुर्याम्) करूँ तो (इमे) ये (लोकाः) सब मनुष्य (उत्सीदेयुः) नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ (च) और मैं (संकरस्य) संकरताका (कर्ता) करनेवाला (स्याम्) होऊँ तथा (इमाः) इस (प्रजाः) समस्त प्रजाको (उपहन्याम्) नष्ट करनेवाला बनूँ।
इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ।