तत्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयो: | गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥28॥
(तु) परंतु (महाबाहो) हे महाबाहो! (गुणकर्मविभागयोः) गुणविभाग और कर्मविभागके (तत्त्ववित्) तत्वको जाननेवाला ज्ञानी अर्थात् तत्वदर्शी (गुणाः) सम्पूर्ण गुण ही (गुणेषु) गुणोंमें (वर्तन्ते) बरत रहे हैं अर्थात् जितनी शक्ति तीनों गुणों रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तमगुण शिव जी में है, उससे पूर्ण परिचित व्यक्ति की आस्था इन में इतनी रह जाती है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 2 श्लोक 45-46 में भी है (इति) ऐसा (मत्वा) समझकर उनमें (न,सज्जते) आसक्त नहीं होता अर्थात् अहंकार त्यागकर तुरन्त शास्त्राअनुकूल साधना करने लग जाता है।
परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम 'गुण विभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्म विभाग' है।) के तत्व (उपर्युक्त 'गुण विभाग' और 'कर्म विभाग' से आत्मा को पृथक अर्थात् निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।