ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवा: | श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभि: ॥31॥
(ये) जो कोई (मानवाः) मनुष्य (अनसूयन्तः) दोषदृष्टिसे रहित और (श्रद्धावन्तः) श्रद्धायुक्त होकर (मे) मेरे (इदम्) इस (मतम्) मत अर्थात् सिद्धांत का (नित्यम्) सदा (अनुतिष्ठन्ति) अनुसरण करते हैं (ते) वे (अपि) भी (कर्मभिः) शास्त्रा विधि त्याग कर अर्थात् सिद्धान्त छोड़ कर किए जाने वाले दोष युक्त कर्मोंसे (मुच्यन्ते) बच जाते हैं।
जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं।