सदृशं चेष्टते स्वस्या: प्रकृतेर्ज्ञानवानपि | प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह: किं करिष्यति ॥33॥
(भूतानि) सभी प्राणी (प्रकृतिम्) प्रकृति अर्थात् स्वभाव को (यान्ति) प्राप्त होते हैं (ज्ञानवान्) ज्ञानवान् (अपि) भी (स्वस्याः) अपने निष्कर्ष द्वारा निकाले भक्ति मार्ग के आधार से (प्रकृृतेः) स्वभावके (सदृृशम्) अनुसार (चेष्टते) चेष्टा करता है (निग्रहः) हठ (किम्) क्या (करिष्यति) करेगा? विशेष:- स्वभाव वश सर्व प्राणी धार्मिक कर्म करते हैं। कहने से भी नहीं मानते। वे राक्षस स्वभाव के व्यक्ति शास्त्रा विधि रहित अर्थात् मेरे मत के विपरीत मनमाना आचरण करते हैं:- प्रमाण गीता अध्याय 16 व 17 में। विचार करें:-- अध्याय 3 के श्लोक 33, 34, 35 का भाव है कि सर्व प्राणी प्रकृति(माया) के वश ही हैं। स्वभाववश कर्म करते हैं। ऐसे ही ज्ञानी भी अपनी आदत वश कर्म करते हैं फिर हठ क्या करेगा। सार: -- शिक्षित व्यक्ति जो तत्वज्ञान हीन हैं अपनी गलत पूजा को नहीं त्यागते चाहे कितना आग्रह करें, चाहे सद्ग्रन्थों के प्रमाण भी दिखा दिए जाऐं वे नहीं मानते। कुछ ज्ञानी-विद्वान पुरुष मान वश पैसा प्राप्ति व अधिक शिष्य बनाने की इच्छा से सच्चाई का अनुसरण नहीं करते। उन तत्वज्ञान हीन सन्तों के अशिक्षित शिष्य व शिक्षित शिष्य प्रमाण देखकर भी उन अज्ञानी सन्तों को नहीं त्यागते सत्य साधना ग्रहण नहीं करते वे मूढ़ हैं। दोनों (ज्ञानी व अज्ञानी) स्वभाव वश चल रहे हैं। इसलिए भक्ति मार्ग गलत दिशा पकड़ चुका है तथा इन दोनों को समझाना व्यर्थ है। गरीब, चातुर प्राणी चोर हैं, मूढ मुग्ध हैं ठोठ। संतों के नहीं काम के, इनकूं दे गल जोट।।
सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा।