न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् | कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: ॥5॥
(हि) निःसन्देह (कश्चित्) कोई भी मनुष्य (जातु) किसी भी कालमें (क्षणम्) क्षणमात्रा (अपि) भी (अकर्मकृृत्) बिना कर्म किये (न) नहीं (तिष्ठति) रहता (हि) क्योंकि (सर्वः) सारा मनुष्य समुदाय (प्रकृतिजैः) प्रकृति अर्थात् दुर्गा जनित (गुणैः) रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिव जी गुणोंद्वारा (अवशः) परवश हुआ (कर्म) कर्म करनेके लिये (कार्यते) बाध्य किया जाता है। (5)(इसी का प्रमाण अध्याय 14 श्लोक 3 से 5 में भी है।)
निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है।