कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् | इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते ॥6॥
(यः) जो (विमूढात्मा) महामूर्ख मनुष्य (कर्मेन्द्रियाणि) समस्त कर्म इन्द्रियोंको हठपूर्वक ऊपरसे (संयम्य) रोककर (मनसा) मनसे उन (इन्द्रियार्थान्) ज्ञान इन्द्रियोंके विषयोंका (स्मरन्) चिन्तन करता (आस्ते) रहता है, (सः) वह (मिथ्याचारः) मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी (उच्यते) कहा जाता है(6)(इसी का विस्तृत वर्णन गीता अध्याय 17 श्लोक 19 में है।)
जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है।