नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: | शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मण: ॥8॥
(त्वम्) तू (नियतम्) शास्त्राविहित (कर्म) कर्म (कुरु) कर (हि) क्योंकि (अकर्मणः) कर्म न करनेकी अपेक्षा अर्थात् एक स्थान पर एकान्त स्थान पर विशेष कुश के आसन पर बैठ कर भक्ति कर्म हठपूर्वक करने की अपेक्षा (कर्म) संसारिक कर्म करते-करते भक्ति कर्म करना (ज्यायः) श्रेष्ठ है (च) तथा (अकर्मणः) कर्म न करनेसे अर्थात् हठयोग करके एकान्त स्थान पर बैठा रहेगा तो (ते) तेरा (शरीरयात्रा) शरीर-निर्वाह अर्थात् तेरा परिवार पोषण (अपि) भी (न) नहीं (प्रसिद्धयेत्) सिद्ध होगा।
तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।