वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता: | बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता: ॥10॥
(वितरागभयक्रोधाः) जिनके राग भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गये और (मन्मयाः) जो मुझमें अनन्य प्रेमपूर्वक स्थित रहते हैं ऐसे (माम्) मेरे (उपाश्रिताः) आश्रित रहनेवाले (बहवः) बहुत-से भक्त उपर्युक्त (ज्ञानतपसा) ज्ञानरूप तपसे (पूताः) पवित्रा होकर (मद्भावम्) मतावलम्बी अर्थात् शास्त्रा अनुकूल साधना करने वाले स्वभाव के (आगताः) हो चुके हैं।
पहले भी, जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए थे और जो मुझ में अनन्य प्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपर्युक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।