ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् | मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: ॥11॥
(पार्थ) हे अर्जुन! (ये) जो भक्त (माम्) मुझे (यथा) जिस प्रकार (प्रपद्यन्ते) भजते हैं (अहम्) मैं भी (तान्) उनको (तथा) उसी प्रकार (भजामि) भजता हूँ अर्थात् उनका पूरा ध्यान रखता हूँ (एव) वास्तव में (मनुष्याः) सभी मनुष्य (सर्वशः) सब प्रकारसे (मम्) मेरे ही (वत्र्म) व्यवहारका (अनुवर्तन्ते) अनुसरण करते हैं।
हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।