कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण: | अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: ॥17॥
(कर्मणः) शास्त्रा विधि अनुसार कर्मका स्वरूप (अपि) भी (बोद्धव्यम्) जानना चाहिये (च) और (अकर्मणः) शास्त्रा विधि रहित अर्थात् अकर्मका स्वरूप भी (बोद्धव्यम्) जानना चाहिए (च) तथा (विकर्मणः) मास-मदिरा तम्बाखु सेवन तथा चोरी - दुराचार आदि विकर्मका स्वरूप भी (बोद्धव्यम्) जानना चाहिए (हि) क्योंकि (कर्मणः) कर्मकी (गतिः) गति (गहना) गहन है। (17) भावार्थ:- तत्वज्ञान को जान कर शास्त्रा अनुकूल भक्ति कर्म से होने वाले लाभ से तथा शास्त्रा विधि रहित भक्ति कर्म से तथा मांस, मदिरा, तम्बाखु सेवन व चोरी, दुराचार करना झूठ बोलना आदि बुरे कर्म से होने वाली हानि का ज्ञान होना अनिवार्य है। उसके लिए इस अध्याय के मंत्रा 34 में विवरण है।
कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्मण का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्म की गति गहन है।