कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य: | स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत् ॥18॥
(यः) जो मनुष्य (कर्मणि) कर्म अर्थात् शास्त्रा अनुकूल साधना रूपी करने योग्य कर्म तथा (अकर्म) अकर्म अर्थात् शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण न करने योग्य कर्म को (पश्येत्) देखता है अर्थात् जान लेता है (च) और (यः) जो (अकर्मणि) अकर्म अर्थात् वह शास्त्रा विरुद्ध साधना न करने योग्य कर्म को नहीं करता (कर्म) कर्म अर्थात् करने योग्य कर्म को करता है (सः) वह (मनुष्येषु) मनुष्योंमें (बुद्धिमान्) बुद्धिमान है और (सः) वह (युक्तः) योगी (कृत्स्न्नकर्मकृत्) समस्त शास्त्रा विधि अनुसार ही कर्मोंको करनेवाला है।
जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है।