निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रह: | शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥21॥
(यतचित्तात्मा) शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति प्राप्त आत्मा (त्यक्तसर्वपरिग्रहः) जिसने समस्त शास्त्रा विरुद्ध संग्रह की हुई साधनाओं का परित्याग कर दिया है ऐसा (निराशीः) अविधिवत् साधना को फैंका हुआ अर्थात् शास्त्रा विधि रहित साधना त्यागा हुआ भक्त (केवलम्) केवल (शरीरम्) हठ योग न करके शरीर से जो आसानी से होने वाली सहज साधना तथा शरीर सम्बन्धी (कर्म) संसारिक कर्म तथा शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति कर्म (कुर्वन्) करता हुआ (किल्बिषम्) क्योंकि शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् पूजा करने वालों को गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 में राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म अर्थात् शास्त्रा विधि त्याग कर मनमाना आचरण करने वाले, मूर्ख मेरी भक्ति भी नहीं करते, वे केलव तीनों गुणों अर्थात् रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी की भक्ति करके उनसे मिलने वाली क्षणिक राहत पर आश्रित रहते हैं। इन्हीं तीनों गुणों अर्थात् श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी की साधना शास्त्रा विधि रहित कही है इस शास्त्रा विधि रहित साधना को त्याग कर शास्त्राविधि अनुसार भक्ति करता है। वह पापको (न) नहीं (आप्नोति) प्राप्त होता। यही प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 47-48 में भी है।
जिसका अंतःकरण और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है और जिसने समस्त भोगों की सामग्री का परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित पुरुष केवल शरीर-संबंधी कर्म करता हुआ भी पापों को नहीं प्राप्त होता।