श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञ: परन्तप | सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥33॥
(परन्तप, पार्थ) हे परंतप अर्जुन! (द्रव्यमयात्) द्रव्यमय अर्थात् धन के द्वारा किये जाने वाले दान, भण्डारे आदि (यज्ञात्) यज्ञ अर्थात् धार्मिक कर्मों की अपेक्षा (ज्ञानयज्ञः) ज्ञानयज्ञ (श्रेयान्) अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा (सर्वम्) सम्पूर्ण (कर्म)शास्त्रा अनुकूल कर्म (अखिलम् ज्ञाने) सम्पूर्ण ज्ञान अर्थात् तत्वज्ञानमें (परिसमाप्यते)समाप्त हो जाते हैं।
हे परंतप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा यावन्मात्र सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं।