Chapter 4, Verse 40



अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति | नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन: ॥40॥

Word Meanings

जो साधक उस तत्वदर्शी संत के ज्ञान व साधना पर अविश्वास करता है वह (अज्ञः) विवेकहीन (च) और (अश्रद्दधानः) श्रद्धारहित (च) तथा (संशयात्मा) संश्ययुक्त मनुष्य (विनश्यति) भक्ति मार्ग से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है ऐसे (संशयात्मनः) संश्ययुक्त मनुष्यके लिये (न) न (अयम्) यह (लोकः) लोक में (न) न (परः) परलोक में (सुखम्) सुख (न अस्ति) नहीं है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 6 श्लोक 40 में भी है।

Translation

विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है।