अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् | प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥6॥
(अजः) मनुष्यों की तरह मैं जन्म न लेने वाला और (अव्ययात्मा) अविनाशीआत्मा (सन्) होते हुए (अपि) भी तथा (भूतानाम्) मेरे इक्कीस ब्रह्मण्डों के प्राणियोंका (ईश्वरः) ईश्वर (सन्) होते हुए (अपि) भी (स्वाम्) अपनी (प्रकृतिम्) प्रकृृति अर्थात् दुर्गा को (अधिष्ठाय) अधीन करके अर्थात् पत्नी रूप में रखकर (आत्ममायया) अपने अंश अर्थात् पुत्रा श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, व शिव जी उत्पन्न करता हूँ, फिर उन्हें श्री कृष्ण, श्री राम, श्री परसुराम आदि अंश अवतार (सम्भवामि) प्रकट करता हूँ।
मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।