श्रीभगवानुवाच | अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य: | स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय: ॥1॥
(यः) जो साधक (कर्मफलम्) कर्मफलका (अनाश्रितः) आश्रय न लेकर (कार्यम्) शास्त्रा विधि अनुसार करनेयोग्य (कर्म) भक्ति कर्म (करोति) करता है (सः) वह (सन्यासी) सन्यासी अर्थात् शास्त्रा विरुद्ध साधना कर्मों को त्यागा हुआ व्यक्ति (च) तथा (योगी) योगी अर्थात् भक्त है (च) और (निरग्निः) वासना रहित (न) नहीं है (च) तथा केवल (अक्रियः) एक स्थान पर बैठ कर विशेष आसन आदि लगा कर लोक दिखावा करके क्रियाओंका त्याग करने वाला भी योगी (न) नहीं है। भावार्थ है कि जो हठ योग करके दम्भ करता है मन में विकार है, ऊपर से निष्क्रिय दिखता है वह न सन्यासी है, न ही कर्मयोगी अर्थात् भक्त है।
श्री भगवान बोले- जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है।