शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मन: | नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥11॥
(शुचै) शुद्ध (देशे) स्थान में जिसके ऊपर क्रमशः (चैलाजिनकुशोत्तरम्) कुशा मृगछाला और वस्त्रा बिछे हैं जो (न) न (अत्युच्छ्रितम्) बहुत ऊँचा है और (न) न (अतिनीचम्) बहुत नीचा ऐसे (आत्मनः) अपने (आसनम्) आसनको (स्थिरम्) स्थिर (प्रतिष्ठाप्य) स्थापन करके।
शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके।