तं विद्याद् दु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् | स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥23॥
(तम्) अज्ञान अंधकार से अज्ञात पूर्ण परमात्मा के (योगसज्ञितम्) वास्तविक भक्ति ज्ञान को (विद्यात्) जानना चाहिए। (दुःख संयोग) जो पापकर्मों के संयोग से उत्पन्न दुःख का (वियोगम्) अन्त अर्थात् छूटकारा करता है (सः) वह (योगः) भक्ति (अनिर्विण्णचेतसा) न उकताये अर्थात् न मुर्झाए् हुए चितसे (निश्चयेन) निश्चयपूर्वक (योक्तव्यः) करना कत्र्तव्य है अर्थात् करनी चाहिए।
जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है।