प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् | उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥27॥
(एनम्) शास्त्रा विधि त्यागकर साधना करना पाप है इसलिए इस पाप को (हि) निश्चय ही त्याग कर (प्रशान्तमनसम्) जिस शास्त्रा अनुकूल साधक का मन भली प्रकार एक पूर्ण परमात्मा में शांत है (अकल्मषम्) जो पापसे रहित है, (शान्तरजसम्) जो भौतिक सुख नहीं चाहता (ब्रह्मभूतम्) परमात्मा के हंस (योगिनम्) विधिवत् साधक को (उत्तमम्) उत्तम (सुखम्) आनन्द (उपैति) प्राप्त होता है अर्थात् पूर्ण मुक्ति प्राप्त होती है।
क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शांत है, जो पाप से रहित है और जिसका रजोगुण शांत हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को उत्तम आनंद प्राप्त होता है।