आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते | योगारूढस्य तस्यैव शम: कारणमुच्यते ॥3॥
(योगम्) योग अर्थात् भक्ति में (आरुरुक्षोः) आरूढ़ होनेकी इच्छावाले (मुनेः) मननशील साधकके लिये (कर्म) शास्त्रा अनुकूल भक्ति कर्म करना ही (कारणम्) हेतु अर्थात् भक्ति का उद्देश्य (उच्यते) कहा जाता है (तस्य) उस (योगारूढस्य) भक्ति में संलग्न साधकका (शमः) जो सर्वसंकल्पोंका अभाव है वही (एव) वास्तव में (कारणम्) भक्ति करने का कारण अर्थात् हेतु (उच्यते) कहा जाता है।
योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है, वही कल्याण में हेतु कहा जाता है।