Chapter 6, Verse 40



श्रीभगवानुवाच | पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते | न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥40॥

Word Meanings

(पार्थ) हे पार्थ! (एव) वास्तव में पथ भ्रष्ट साधक (न) न तो (इह) यहाँ का रहता है (न) न (अमुत्रा) वहाँ का रहता है। (तस्य) उसका (विनाशः) विनाश ही (विद्यते) जाना जाता है (हि) निसंदेह (कश्चित्) कोई भी व्यक्ति जो (न कल्याणकृृत्) अन्तिम स्वांस तक मर्यादा से आत्म कल्याण के लिए कर्म करने वाला नहीं है अर्थात् जो योग भ्रष्ट हो जाता है (तात) हे प्रिय वह तो (दुर्गतिम्) दुर्गति को (गच्छति) चला जाता है अर्थात् प्राप्त होता है। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 4 श्लोक 40 में भी है। भावार्थ:- गीता जी अन्य अनुवाद कर्ताओं ने इस श्लोक 40 में लिखा है कि योग भ्रष्ट अर्थात् जिसका मन वश नहीं है वह साधक इस लोक में भी नष्ट नहीं होता तथा परलोक में भी नष्ट नहीं होता। जबकि अध्याय 6 श्लोक 36 में लिखा है कि मेरे मत (विचार) अनुसार जिसका मन वश नहीं है उस को भक्ति (योग) का लाभ मिलना दुष्प्राप्य है अर्थात् भक्ति लाभ नहीं है। वह योग तो मन वश किए हुए को ही शक्य है। विचार करें फिर श्लोक 40 का यह अर्थ करना कि वह योग भ्रष्ट व्यक्ति न तो इस लोक में नष्ट होता है न परलोक में न्याय संगत नहीं है। क्योंकि अध्याय 6 श्लोक 42 से 44 तक में भी यही प्रमाण है कहा है योग भ्रष्ट व्यक्ति योग भ्रष्ट होने से पूर्व के भक्ति संस्कार से कुछ दिन स्वर्ग में जाता है फिर अच्छे कुल में मानव जन्म प्राप्त करता है। परन्तु पुनः वह मानव जन्म इस लोक मे अत्यन्त दुर्लभ है। यदि मानव जन्म प्राप्त हो जाता है तो पूर्व के स्वभाव वश मनमाना आचरण करके तत्वज्ञान का उल्लंघन कर जाता है अर्थात् नष्ट हो जाता है। इसलिए श्लोक 40 का अनुवाद उपरोक्त सही है अध्याय 6 श्लोक 45 में भी स्पष्ट है। उदाहरण:- जड़भरत नाम के योगी का एक हिरण के बच्चे में मोह हो जाने से भक्ति मार्ग से भ्रष्ट होने से हिरण का ही जन्म प्राप्त हुआ तथा दुर्गति को प्राप्त हुआ।

Translation

श्री भगवान बोले- हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धार के लिए अर्थात भगवत्प्राप्ति के लिए कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।