प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वती: समा: | शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥41॥
(योगभ्रष्टः) योगभ्रष्ट पुरुष (पुण्यकृृताम्) चैरासी लाख योनियों के कष्ट के बाद पुण्य कर्मों के आधार पर पुण्यवानोंके (लोकान्) लोकोंको अर्थात् स्वर्गादि लोकोंको (प्राप्य) प्राप्त होकर उनमें (शाश्वतीः) वेद वाणी के आधार से नियत (समाः) समय तक (उषित्वा) निवास करके फिर (शुचीनाम्) शुद्ध आचरणवाले (श्रीमताम्) अच्छे विचारों वाले अर्थात् श्रेष्ठ व्यक्तियों के (गेहे) घरमें (अभिजायते) जन्म लेता है, नीचे वाले श्लोक 43 में कहा है कि ऐसा जन्म दुर्लभ है।
योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को अर्थात स्वर्गादि उत्तम लोकों को प्राप्त होकर उनमें बहुत वर्षों तक निवास करके फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमान पुरुषों के घर में जन्म लेता है।