श्रीभगवानुवाच | मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रय: | असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥1॥
(पार्थ) हे पार्थ! (मयि,आसक्तमनाः) मुझमें आसक्तचित भावसे (मदाश्रयः) मतके परायण होकर (योगम्) योगमें (यु×जन्) लगा हुआ तू (यथा) जिस प्रकारसे (समग्रम्) सम्पूर्ण रूपसे (माम्) मुझको (असंशयम्) संश्यरहित (ज्ञास्यसि) जानेगा (तत्) उसको (श्रृणु) सुन। केवल हिन्दी अनुवाद: हे पार्थ! मुझमें आसक्तचित भाव से मेरे मत के परायण होकर योगमें लगा हुआ तू जिस प्रकारसे सम्पूर्ण रूपसे मुझको संश्यरहित जानेगा उसको सुन।
श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्त चित तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानेगा, उसको सुन।