तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णम्युत्सृजामि च | अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥19॥
(अहम्) मैं ही (तपामि) सूर्यरूपसे तपता हूँ (वर्षम्) वर्षा का (निगृृह्णामि) आकर्षण करता हूँ (च) और उसे (उत्सृजामि) बरसाता हूँ (अर्जुन) हे अर्जुन! (अहम्) मैं (एव) ही (अमृतम्) अमृत (च) और (मृत्युः) मृत्यु हूँ (च) और (सत् च असत्) सत् और असत् अर्थात् सच्च तथा झूठ का हेतु भी (अहम्) मैं ही हूँ।
मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत्-असत् भी मैं ही हूँ।