अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते | तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥22॥
(ये) जो (अनन्याः) अनन्य प्रेमी (जनाः) भक्तजन (माम्) मुझको (चिन्तयन्तः) चिन्तन करते हुए (पर्युपासते) उस पूर्ण परमात्मा को निष्कामभावसे भजते हैं (तेषाम्) उन (नित्याभियुक्तानाम्) नित्य निरन्तर साधना करने वाले पुरुषोंका (योगक्षेमम्) योगक्षेम अर्थात् साधना की रक्षा (अहम्) मैं (वहामि) करता हूँ। भावार्थ:-- गीता ज्ञान दाता प्रभु कह रहा है कि जो पूर्ण परमात्मा को प्राप्त होने के लिए ओम्-तत्-सत् के मन्त्रा में मेरे ओम् नाम का चिन्तन करते हुए उसे परमात्मा की उपासना करता है। उस की साधना की रक्षा भी मैं ही करता हूँ। विशेष:-- अन्य अनुवाद कर्ताओं ने लिखा है कि ‘‘जो अनन्य प्रेमी मुझको चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं विचार करें:--चिन्तन करना तथा भजना एक ही अर्थ के बोधक है इसलिए अन्य अनुवाद कर्ताओं द्वारा किया अनुवाद न्याय संगत नहीं है।
जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उन नित्य-निरंतर मेरा चिंतन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम (भगवत्स्वरूप की प्राप्ति का नाम 'योग' है और भगवत्प्राप्ति के निमित्त किए हुए साधन की रक्षा का नाम 'क्षेम' है) मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ।