येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता: | तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥23॥
(कौन्तेय) हे अर्जुन! (श्रद्धया) श्रद्धासे (अन्विताः) युक्त (अपि) भी (ये) जो (भक्ताः) भक्त (अन्यदेवताः) दूसरे देवताओंको (यजन्ते) पूजते हैं, (ते) वे (अपि) भी (माम्) मुझको (एव) ही (यजन्ति) पूजते हैं किंतु उनका वह पूजन (अविधिपूर्वकम्) अविधिपूर्वक अर्थात् शास्त्रा विरूद्ध है। विशेष:--इसी का प्रमाण गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में कहा है कि जो शास्त्रा विधि को त्याग कर मनमाना (अविधिपूर्वक) आचरण (पूजा) करता है वह न तो परमशान्ति को प्राप्त होता है, उसका न कोई कार्य सिद्ध होता है तथा न ही उसकी परमगति ही होती है अर्थात् व्यर्थ है।
हे अर्जुन! यद्यपि श्रद्धा से युक्त जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझको ही पूजते हैं, किंतु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात् अज्ञानपूर्वक है।