Chapter 9, Verse 31



क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति | कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति ॥31॥

Word Meanings

उपरोक्त साधक का ही निम्न श्लोक में विवरण किया है कि वह दुराचारी व्यक्ति मेरे को भजता है अर्थात् मेरे द्वारा दिए भक्ति मार्ग - मत अर्थात् सिद्धांत के आधार से शास्त्रों के पठन-पाठन करके (क्षिप्रम्) शीघ्र ही (धर्मात्मा) साधु जैसे गुणों वाला तो (भवति) हो जाता है परन्तु मेरी साधना से साधक (शश्वत्) कर्म आधार से जन्म-मृृत्यु का सदा रहने वाले चक्र के आधार से बहुत समय के लिए (शान्तिम्) शान्ति को (निगच्छति) प्राप्त करता है अर्थात् एक कल्प तक ब्रह्मलोक में रहता है। उसके पश्चात् कर्म अनुसार अन्य प्राणियों के शरीर धारण करता है। गीता अध्याय 9 श्लोक 7 में भी यही प्रमाण है कहा कि कल्प के अन्त में सर्व प्राणी प्रकृृति में लीन हो जाते है। कल्प की आदि में फिर उत्पन्न करता हूँ। (कौन्तेय) हे कुंती पुत्रा! जो यह (न जानीहि) नहीं जानता (मे) मेरा (भक्तः) भक्त भी (प्रति) वापिस (प्रणश्यति) अदृृश्य हो जाता है अर्थात् मानव शरीर न प्राप्त करके अन्य प्राणियों के शरीर प्राप्त करता है। विशेष:- इसी का प्रमाण पवित्रा गीता अध्याय 7 श्लोक 18, तथा गीता अध्याय 4 श्लोक 40 में स्पष्ट किया है कि पथ भ्रष्ट साधक नष्ट हो जाता है तथा गीता अध्याय 6 श्लोक 30 में प्रणश्यति का अर्थ अदृृश्य होना लिखा है। इस श्लोक 30 में दो बार अर्थ किया है। इसलिए यहाँ अध्याय 9 श्लोक 31 में भी प्रणश्यति का अर्थ अदृृश्य ही अनुकूल है। इसीलिए गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है कि अर्जुन तू सर्व भाव से उस परमात्मा की शरण में जा, उसकी कृप्या से ही तू परमशान्ति को तथा सनातन परम धाम को अर्थात् सतलोक को प्राप्त होगा। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में भी है कि हे अर्जुन गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में वर्णित तत्वदर्शी संत के मिलने पर उस परम पद परमेश्वर की खोज करनी चाहिए, जिसमें गए साधक फिर लौट कर संसार में जन्म-मृत्यु में नहीं आते अर्थात् पूर्ण मोक्ष को प्राप्त करते हैं। जिस परमेश्वर से संसार रूपी वृक्ष विस्तार को प्राप्त हुआ है अर्थात् जिस परमेश्वर ने सर्व ब्रह्मण्डों की रचना की है। मैं भी उसी आदि पुरुष परमेश्वर की शरण में हूँ। इसलिए उसी पूर्ण परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए।

Translation

वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शान्ति को प्राप्त होता है। हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।