किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा | अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥33॥
पवित्रा गीता बोलने वाला प्रभु कह रहा है कि उपरोक्त श्लोक 32 में वर्णित पापी आत्मा भी मेरे वाली परमगति को प्राप्त कर सकते हैं तो (पुनः) फिर (ब्राह्मणाः) ब्राह्मणों (तथा) और (राजर्षयः) राजर्षि (पुण्या) पुण्यशील (भक्ताः) भक्तजनों के लिए (किम्) क्या कठिन है। (माम्) मुझ ब्रह्म के (इमम्) इस (अनित्यम्) नाश्वान (असुखम्) दुःखदाई (लोकम्) लोकों (प्राप्य) प्राप्त होकर अर्थात् जन्म लेकर (भजस्व) उस पूर्ण परमात्मा का भजन कर क्योंकि गीता अध्याय 8 श्लोक 8 से 10, 1 व 3 तथा 20 से 22 में पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति के लिए विस्तार से कहा है तथा अध्याय 8 श्लोक 5.7 व 13 में अपने विषय में कहा है। यहाँ भी संकेतिक संदेश उस पूर्ण परमात्मा के विषय में है तथा निम्न श्लोक 34 में अपने विषय में कहा है कि यदि मेरी शरण में रहना है तथा जन्म-मृत्यु का कष्ट उठाते रहना है तो विशेष:- इसलिए गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में प्रमाण दिया है कि उस परमात्मा की शरण में जा, उसकी कृृप्या से ही तू परम शान्ति तथा सनातन परम धाम को प्राप्त होगा। निम्न श्लोक में कहा है कि मेरे वाली परमगति चाहिए तो
फिर इसमें कहना ही क्या है, जो पुण्यशील ब्राह्मण था राजर्षि भक्तजन मेरी शरण होकर परम गति को प्राप्त होते हैं। इसलिए तू सुखरहित और क्षणभंगुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर निरंतर मेरा ही भजन कर।